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राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान(एनआईटी) श्रीनगर में अनुसंधान लेखन पर पांच दिवसीय कार्यशाला का आयोजन

उत्तराखण्ड

राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान(एनआईटी) श्रीनगर में अनुसंधान लेखन पर पांच दिवसीय कार्यशाला का आयोजन

दैनिक प्रतिपक्ष संवाद प्रदीप कुमार

श्रीनगर गढ़वाल। राष्ट्रीय प्रोद्योगिकी संस्थान (एनआईटी), उत्तराखंड के अनुसंधान और परामर्श (आर एंड सी) अनुभाग द्वारा बाह्य वित्तीय अनुदान के लिए अनुसंधान प्रस्ताव लेखन पर पांच दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया।
कार्यशाला का उद्देश्य बाहरी वित्त पोषण के लिए परियोजना प्रस्ताव प्रस्तुत करने और धन प्रदान किए जाने की संभावना को बढ़ाने के लिए संकाय सदस्यों और शोध छात्रों को प्रभावी वैज्ञानिक लेखन की बारीकियों से अवगत कराना था।
कार्यशाला के उद्घाटन समारोह में प्रोफेसर ललित कुमार अवस्थी निदेशक,एनआईटी उत्तराखंड मुख्य अतिथि और डॉ.अविनाश अग्रवाल, प्रोफेसर, मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग, आईआईटी कानपुर,विशिष्ट अतिथि और मुख्य वक्ता के रूप में मौजूद थे ।
अपने अध्यक्षीय संबोधन में प्रोफेसर अवस्थी ने कहा ने कहा कि आजादी का शताब्दी वर्ष माननें के लिए भारत ने 2047 तक विकसित भारत निर्माण का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया हैं। कहने की आवश्यकता नहीं है कि विकास को प्रोत्साहित करने और आधुनिक समाज का निर्माण करने के पीछे अनुसन्धान, नवाचार और निर्माण की केंद्रीय भूमिका रही है। उन्होंने कहा एनआईटी जैसे उच्च तकनीकी शिक्षण संस्थानों में राष्ट्रीय और स्थानीय विकास की दिशा और दशा बदलने की क्षमता है। इसके लिए विकसित राष्ट्रों की भांति हमें भी शोध, नवाचार और निर्माण पर ध्यान एवं धन दोनों देने की आवश्यकता है। मुझे विश्वास है कि शोधार्थियों के लिए यह कार्यशाला उनकी शोध यात्रा में मील का पत्थर साबित होगी और वित्तीय अनुदान प्राप्त करने के लिए गुणवत्तापरक और प्रतिस्पर्धी परियोजना प्रस्ताव लिखने के कौशल को उजागर करने में मददगार होगी।
मुख्य वक्ता प्रो.अग्रवाल नें अपने व्याखान में कहा कि वित्तीय अनुदान के लिए आवश्यक है की प्रस्ताव में नवाचार,प्रासंगिकता और समाज के लिए उपयोगी होनी चाहिए। उन्होंने कहा ज्यादातर प्रस्ताव फंडिंग एजेंसियां द्वारा गुणवत्ता मानकों को पूरा नहीं कर पाने के कारण अस्वीकृत कर दिए जाते हैं। उन्होंने कहा कि शोध प्रस्ताव के निर्माण में सबसे महत्वपूर्ण यह है कि शोध का क्षेत्र एवं विषय नया होना चाहिए। सामान्य तौर पर शोधार्थी ऐसे क्षेत्रों का चयन कर बैठते हैं जिस पर पहले ही बहुत कार्य हो चुका है। युवा शोधार्थियों को नए क्षेत्रों की ओर नई ऊर्जा से बढ़ना चाहिए। प्रो.अग्रवाल ने वित्तीय अनुदान देने वाली विभिन्न सरकारी,अर्ध सरकारी एवं गैर सरकारी एजेंसियों के बारें में भी जानकारी दी ।
कार्यशाला के दौरान प्रोफेसर अशोक पांडे प्रतिष्ठित वैज्ञानिक, सेंटर फॉर इनोवेशन एंड ट्रांसलेशनल रिसर्च, सीएसआईआर,डिपार्टमेंट ऑफ़ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (डीएसटी), नई दिल्ली के द्विपक्षीय अंतर्राष्ट्रीय सहयोग अनुभाग के प्रमुख डॉ.संजय के. वार्ष्णेय,प्रो.अक्षय द्विवेदी डीन, प्रायोजित अनुसंधान और औद्योगिक परामर्श (एसआरआईसी),आईआईटी रुड़की,और अनुसंधान विकास निगम के पूर्व प्रमुख गोविंद शर्मा नें शोधकर्ताओं को एक वैज्ञानिक विचार के विकास से लेकर उसके सफल निष्पादन तक के महत्वपूर्ण चरणों के बारे में शिक्षित किया।
कार्यशाला के सफल आयोजन सक्रिय भूमिका के लिए निदेशक नें डॉ.सनत अग्रवाल (डीन.आर.एंड.सी), डॉ.हरदीप कुमार एवं डॉ.पंकज पाल की सराहना की।

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