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उत्तराखंड सरकार ने खर्च कर दिए लाखों रुपए , फिर भी धगुली, हंसुली, छुबकि, पैजनि और झुमकि नहीं पहुंच पाई स्कूल .. अभी तक स्कूल के बच्चे कर रहे हैं इनका इंतजार ।।

कुमाऊं

उत्तराखंड सरकार ने खर्च कर दिए लाखों रुपए , फिर भी धगुली, हंसुली, छुबकि, पैजनि और झुमकि नहीं पहुंच पाई स्कूल .. अभी तक स्कूल के बच्चे कर रहे हैं इनका इंतजार ।।

आखिर कुमाऊंनी किताबें क्यों बनी शोपीस

कुमाऊं – राज्य में दावे तो बड़े-बड़े होते हैं लेकिन वह हवा के झोंके की तरह ही उड़ जाते हैं , कुमाऊंनी बोली के संरक्षण के लिए इसे पाठ्यक्रम में जोड़ने और भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग लंबे समय से चल रही है। इसके लिए भी सरकार ने एक नई योजना बनाई जिस योजना को खूब प्रसारित किया गया लेकिन वह जमीन में नहीं उतर पाई ..सरकार के द्वारा नई शिक्षा नीति में भी लोक- भाषाओं पाठ्यक्रम को शामिल करने पर जोर दिया गया है। शैक्षिक सत्र 2020 में कुमाऊं के प्राथमिक विद्यालयों में कुमाऊंनी पाठ्यक्रम शुरू करने की योजना थी लेकिन यह योजना परवान नहीं चढ़ सकी है ।हाल यह हैं कि पहाड़ी क्षेत्रों में वह किताब पहुंच नहीं पाई हैं अगर पहुंच भी पाई हैं तो उनसे पढ़ाया नहीं जा रहा है , नैनीताल जिले के स्कूलों में कुमाऊंनी किताबें केवल शोपीस बनी हुई हैं।

2020 से शुरू हुई योजना आज तक लागू नहीं

आपको बता दें नई पीढ़ी को कुमाऊंनी बोली से जोड़ने के लिए प्राथमिक स्कूलों में कुमाऊंनी पाठ्यक्रम शुरू करने की योजना थी। शैक्षिक सत्र 2020 में कुमाऊं मंडल के सभी जिलों के एक-एक ब्लॉक के सरकारी स्कूलों में कुमाऊंनी पाठ्यक्रम से पढ़ाई शुरू होनी थी। इसके बाद सभी सरकारी और निजी स्कूलों में भी कुमाऊंनी पाठ्यक्रम को अनिवार्य करने की योजना थी।

इसके लिए लाखों रुपये खर्च कर पुस्तकें भी छपवाई गई लेकिन कुमाऊं के सभी प्राथमिक विद्यालयों तक ये पुस्तकें आज तक नहीं पहुंच पाई हैं। नैनीताल जिले के सभी प्राथमिक स्कूलों के साथ ही अल्मोड़ा और बागेश्वर जिले के एक-एक ब्लॉक के प्राथमिक स्कूलों में कुमाऊंनी किताबों के सेट पहुंचे तो हैं लेकिन ये किताबें केवल शोपीस बनी हुई हैं।

आखिर क्यों लापरवाह बना है पूरा ही सिस्टम

इस लिए कहा जा रहा है कुमाऊंनी पाठ्यक्रम शुरू करने के लिए शिक्षा विभाग के पास कोई ठोस कार्ययोजना न होने के कारण छात्र-छात्राओं को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है। लीलाधर व्यास, अपर निदेशक माध्यमिक शिक्षा, कुमाऊं मंडल ने कहा “सभी प्राथमिक विद्यालयों में किताबें बांट गई हैं। सभी विद्यालयों में कुमाऊंनी पुस्तकों की पढ़ाई सुनिश्चित की जाएगी। इस संबंध में आवश्यक मॉनिटरिंग की जाएगी और स्कूलों से प्रगति रिपोर्ट भी मांगी जाएगी”..

लोककथाएं, लोकगीत, झोड़ा, कथा कहानी, कविताएं, नाटक, दंतकथा पढ़ना बना केवल सपना

आपको बता दें भीमताल डायट ने 2019 में कुमाऊंनी पुस्तकें तैयार की थीं। कक्षा एक के लिए धगुली, कक्षा दो के लिए हंसुली, कक्षा तीन के लिए छुबकि, कक्षा चार के लिए पैजनि और कक्षा पांच के लिए झुमकि पुस्तक तैयार की गई थी। इसके अलावा, मिलीक बाव, फटक मारणी जुराब, रानी लै और मिलीक गुब्बारा पुस्तकें बनाई गई थीं। इन किताबों में कुमाऊंनी संस्कृति पर आधारित लोककथाएं, लोकगीत, झोड़ा, कथा कहानी, कविताएं, नाटक, दंतकथा, डायरी संस्मरण, यात्रा वृतांत समाहित हैं।इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि सरकार जिस योजना को जमीन में उतरना चाहती है उसको लेकर कितना संवेदनशील है और कितने प्रयास करती है .. लाखों रुपए खर्च कर कुमाऊंनी किताबों का न पहुंचना दुखद है ।।

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