उत्तराखण्ड
उत्तराखंड के अनमोल रत्न पद्मश्री डॉ. यशोधर मठपाल जी के साथ पांच अविस्मरणीय घंटे


90 वर्ष की आयु में भी अद्भुत ऊर्जा, सादगी और ज्ञान के धनी व्यक्तित्व का सान्निध्य बना जीवन की अनमोल स्मृति
कुछ मुलाकातें केवल संयोग नहीं होतीं, बल्कि जीवनभर के लिए प्रेरणा बन जाती हैं। कुछ यात्राएं केवल दूरी तय करने के लिए शुरू होती हैं, लेकिन अपने पीछे ऐसी यादें छोड़ जाती हैं, जिन्हें शब्दों में पूरी तरह व्यक्त करना कठिन होता है। आज मेरे जीवन में भी एक ऐसा ही अविस्मरणीय अनुभव जुड़ गया।
उत्तराखंड की पावन धरती प्राकृतिक सौंदर्य, आध्यात्मिक चेतना और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। लेकिन इस देवभूमि की वास्तविक पहचान उन महान विभूतियों से भी है, जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन यहां की कला, संस्कृति, इतिहास और विरासत को संरक्षित करने में समर्पित कर दिया।
ऐसी ही एक विलक्षण विभूति हैं भीमताल के गौरव, पद्मश्री से अलंकृत डॉ. यशोधर मठपाल जी। प्रख्यात कला एवं संस्कृति मर्मज्ञ, पुरातत्त्वविद् और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए समर्पित उनका व्यक्तित्व उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए गौरव का विषय है।
आज मुझे इस महान व्यक्तित्व के साथ ऋषिकेश से हल्द्वानी तक यात्रा करने और लगभग पांच घंटे उनके सान्निध्य में बिताने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। सच कहूं तो मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि एक दिन मुझे उत्तराखंड की ऐसी महान विभूति के साथ इतने आत्मीय क्षण बिताने का अवसर मिलेगा।
यह मेरे लिए केवल एक यात्रा नहीं थी, बल्कि अनुभव, ज्ञान, विनम्रता और जीवन के प्रति अद्भुत उत्साह को निकट से देखने का एक अनमोल अवसर था।
ऋषिकेश में मुलाकात और हल्द्वानी तक का यादगार सफर
आज पूर्व मुख्यमंत्री एवं पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ जी के कार्यक्रम के सिलसिले में डॉ. यशोधर मठपाल जी ऋषिकेश आए हुए थे। इसी दौरान उनसे मुलाकात हुई।
किसी महान व्यक्ति से मिलना अपने आप में सुखद होता है, लेकिन जब वही व्यक्ति सहज आत्मीयता के साथ आपके साथ यात्रा करे, अपने अनुभव साझा करे और आपको अपनेपन का एहसास कराए, तो वह अनुभव और भी विशेष बन जाता है।
मुलाकात के बाद डॉ. मठपाल जी मेरे वाहन में मेरे साथ हल्द्वानी तक आए। उनके पुत्र श्री सुरेश मठपाल जी भी हमारे साथ थे।
ऋषिकेश से हल्द्वानी तक का यह सफर लगभग पांच घंटे का रहा, लेकिन इन पांच घंटों में जो आत्मीयता, आनंद और प्रेरणा मिली, उसने इस यात्रा को मेरे जीवन की यादगार घटनाओं में शामिल कर दिया।
समय कब बीत गया, इसका पता ही नहीं चला। जब साथ में इतना अनुभवी, ज्ञानवान और सरल व्यक्तित्व हो, तो यात्रा की लंबाई मायने नहीं रखती। ऐसे सान्निध्य में बिताया गया प्रत्येक क्षण अपने आप में एक सीख बन जाता है।
मेरे लिए यह अत्यंत सौभाग्य की बात थी कि उत्तराखंड की कला और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण में अपना जीवन समर्पित करने वाले डॉ. मठपाल जी को इतने निकट से जानने और उनके व्यक्तित्व को समझने का अवसर मिला।
लगभग 90 वर्ष की आयु में भी युवाओं जैसा जोश!
इस मुलाकात ने मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया तो वह था डॉ. यशोधर मठपाल जी का अद्भुत उत्साह, उनकी सक्रियता और जीवन के प्रति उनका सकारात्मक दृष्टिकोण।
लगभग 90 वर्ष की आयु में भी उनके भीतर जो ऊर्जा, जिज्ञासा और जीवंतता दिखाई देती है, वह वास्तव में आश्चर्यचकित करने वाली है।
आमतौर पर उम्र बढ़ने के साथ व्यक्ति की सक्रियता कम होने लगती है, लेकिन डॉ. मठपाल जी का व्यक्तित्व यह संदेश देता है कि यदि मन में कुछ करने का जुनून हो, तो उम्र केवल एक संख्या बनकर रह जाती है।
उन्हें देखकर मन में सहज ही यह विचार आया कि वास्तविक युवा वह नहीं है जिसकी उम्र कम हो, बल्कि वह है जिसके भीतर सीखने की ललक, विचारों की ताजगी और जीवन के प्रति उत्साह निरंतर बना रहे।
उनकी ऊर्जा देखकर मैं अत्यंत प्रफुल्लित हुआ। यह अनुभव मेरे लिए विशेष रूप से प्रेरणादायी रहा।
डॉ. यशोधर मठपाल जी को देखकर लगा कि उम्र शरीर की हो सकती है, लेकिन यदि मन में उत्साह और उद्देश्य जीवित हों, तो व्यक्तित्व सदैव ऊर्जावान बना रहता है।
पद्मश्री सम्मान से अलंकृत उत्तराखंड की गौरवशाली विभूति
डॉ. यशोधर मठपाल जी की उपलब्धियां और उनका सांस्कृतिक योगदान उन्हें विशिष्ट पहचान प्रदान करते हैं। कला एवं संस्कृति के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए भारत सरकार ने वर्ष 2006 में उन्हें पद्मश्री सम्मान से अलंकृत किया।
पद्मश्री भारत के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मानों में से एक है। इस सम्मान से अलंकृत होना उनके दीर्घकालीन परिश्रम, कला के प्रति समर्पण और भारतीय सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण में उनके योगदान का गौरवपूर्ण परिचायक है।
उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि सच्ची लगन, निरंतर साधना और अपने उद्देश्य के प्रति निष्ठा व्यक्ति को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाती है।
लेकिन डॉ. मठपाल जी के व्यक्तित्व की सबसे सुंदर विशेषता यह है कि इतनी बड़ी उपलब्धि और सम्मान के बावजूद उनकी सादगी, सहजता और विनम्रता बरकरार है।
लगभग 90 वर्ष की आयु में भी उनका उत्साह और सक्रियता देखकर मन में सम्मान के साथ-साथ प्रेरणा का भाव जागता है। उनके व्यक्तित्व से यह सीख मिलती है कि वास्तविक महानता केवल पुरस्कारों और सम्मानों में नहीं, बल्कि जीवनभर अपने कार्य के प्रति समर्पित रहने और दूसरों के लिए प्रेरणा बनने में है।
पद्मश्री से अलंकृत डॉ. यशोधर मठपाल जी केवल उत्तराखंड की शान नहीं, बल्कि भारतीय कला, संस्कृति और विरासत के प्रति समर्पण की एक प्रेरणादायी मिसाल हैं।
कला, संस्कृति और इतिहास के प्रति जीवनभर का समर्पण
डॉ. यशोधर मठपाल जी का नाम उत्तराखंड की कला, संस्कृति और ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण के संदर्भ में अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है।
उन्होंने अपना जीवन भारतीय कला, प्राचीन सांस्कृतिक परंपराओं और ऐतिहासिक विरासत को समझने, संजोने और उसके महत्व को सामने लाने जैसे कार्यों में समर्पित किया है।
भीमताल क्षेत्र से उनका जुड़ाव और उनके द्वारा स्थापित संग्रहालय उनकी सांस्कृतिक साधना की महत्वपूर्ण पहचान हैं।
किसी भी समाज की पहचान केवल उसकी आर्थिक प्रगति या आधुनिक उपलब्धियों से नहीं होती। उसकी वास्तविक पहचान उसकी सांस्कृतिक जड़ों, लोक परंपराओं, ऐतिहासिक धरोहरों और उन लोगों से बनती है, जो इन धरोहरों को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखते हैं।
डॉ. मठपाल जी जैसे साधक हमें यह समझाते हैं कि हमारी विरासत केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि हमारी पहचान और भविष्य की अमूल्य पूंजी है।
उत्तराखंड की संस्कृति, कला और इतिहास को संरक्षित करने वाले ऐसे व्यक्तित्व वास्तव में प्रदेश की जीवंत धरोहर हैं।
आज उनके साथ बिताए पांच घंटों ने मुझे यह अनुभव कराया कि किसी महान व्यक्ति का वास्तविक परिचय केवल उनकी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि उनके विचारों, अनुभवों और जीवन के प्रति उनके दृष्टिकोण से भी होता है।
जीवनगाथा की पुस्तक भेंट कर दिया आत्मीयता का अनमोल उपहार
इस यात्रा का एक अत्यंत भावपूर्ण पक्ष तब सामने आया, जब डॉ. यशोधर मठपाल जी ने मुझे अपने जीवन पर आधारित पुस्तक भेंट की।
मेरे लिए यह केवल एक पुस्तक प्राप्त करना नहीं था, बल्कि उनके जीवन के अनुभवों, विचारों, संघर्षों और साधना को और निकट से जानने का अवसर था।
जिस व्यक्ति ने अपने जीवन का इतना बड़ा हिस्सा कला, संस्कृति और विरासत के संरक्षण में लगाया हो, उसकी जीवनगाथा अपने आप में प्रेरणा का स्रोत होती है।
ऐसी पुस्तक केवल पढ़ने की सामग्री नहीं होती, बल्कि वह एक जीवन के अनुभवों और विचारों की विरासत को समझने का माध्यम बन जाती है।
उनसे यह पुस्तक प्राप्त करना मेरे लिए अत्यंत सुखद और गर्व का क्षण था। मैं इसे उनके स्नेह और आत्मीयता की एक अनमोल स्मृति के रूप में संजोकर रखूंगा।
इसके साथ ही उन्होंने मुझे अपने संग्रहालय आने का निमंत्रण भी दिया।
उनका यह आत्मीय आमंत्रण मेरे लिए विशेष महत्व रखता है। मैं इसे केवल एक स्थान पर जाने का निमंत्रण नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को और निकट से देखने, समझने और उसके महत्व को जानने का अवसर मानता हूं।
मुझे आशा है कि भविष्य में उनके संग्रहालय जाकर वहां संरक्षित धरोहरों को देखने और इस क्षेत्र में उनके अनुभवों से और अधिक सीखने का अवसर अवश्य प्राप्त होगा।
सादगी में छिपी महानता
आज के समय में जब व्यक्ति की पहचान अक्सर उसके पद, प्रतिष्ठा, प्रभाव और उपलब्धियों के आधार पर की जाती है, तब डॉ. यशोधर मठपाल जी जैसे व्यक्तित्व हमें महानता का वास्तविक अर्थ समझाते हैं।
उनके व्यक्तित्व में अनुभव की गहराई है, लेकिन अहंकार नहीं; ज्ञान की व्यापकता है, लेकिन दिखावा नहीं; जीवनभर की साधना है, लेकिन सहजता और आत्मीयता भी है।
यही गुण किसी व्यक्ति को केवल सफल नहीं, बल्कि सम्माननीय बनाते हैं।
उनके साथ बिताए पांच घंटों में मुझे यह महसूस हुआ कि महानता केवल बड़े कार्य करने में नहीं, बल्कि अपने व्यवहार से दूसरों के मन में सम्मान और प्रेरणा उत्पन्न करने में भी निहित है।
कभी-कभी जीवन में एक मुलाकात वर्षों के अनुभव के समान सीख दे जाती है। आज का दिन मेरे लिए ऐसा ही रहा।
उत्तराखंड की वास्तविक संपदा हैं ऐसी विभूतियां
जब हम उत्तराखंड की बात करते हैं, तो हमारे सामने हिमालय की ऊंची चोटियां, कल-कल बहती नदियां, हरे-भरे जंगल, धार्मिक तीर्थस्थल और मनमोहक प्राकृतिक दृश्य उभर आते हैं।
लेकिन उत्तराखंड की पहचान केवल इसकी प्राकृतिक सुंदरता तक सीमित नहीं है।
इस देवभूमि की सबसे बड़ी संपदाओं में वे लोग भी शामिल हैं, जिन्होंने अपनी प्रतिभा, मेहनत और समर्पण से इसकी संस्कृति, इतिहास और प्रतिष्ठा को समृद्ध किया है।
डॉ. यशोधर मठपाल जी ऐसी ही एक अमूल्य विभूति हैं।
उनका जीवन हमें प्रेरित करता है कि हम अपनी सांस्कृतिक जड़ों को पहचानें, अपने इतिहास को समझें और उन लोगों का सम्मान करें, जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी इन धरोहरों को बचाने और आगे बढ़ाने में लगा दी।
ऐसी विभूतियों से मिलना, उनके अनुभव सुनना और उनके व्यक्तित्व से प्रेरणा लेना अपने आप में सौभाग्य की बात है।
मेरा मानना है कि नई पीढ़ी को भी डॉ. मठपाल जी जैसे व्यक्तित्वों के जीवन और कार्यों से परिचित कराया जाना चाहिए, ताकि उनमें अपनी संस्कृति, इतिहास और विरासत के प्रति सम्मान की भावना विकसित हो।
पांच घंटे का सफर, जीवनभर की स्मृति
ऋषिकेश से हल्द्वानी तक की यह यात्रा मेरे लिए हमेशा विशेष रहेगी।
आज मुझे न केवल एक महान कला एवं संस्कृति मर्मज्ञ के साथ समय बिताने का अवसर मिला, बल्कि उनके सहज व्यक्तित्व, अद्भुत उत्साह और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण को निकट से अनुभव करने का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ।
उनके द्वारा अपनी जीवनगाथा पर आधारित पुस्तक भेंट करना और संग्रहालय आने का निमंत्रण देना इस मुलाकात को और भी यादगार बना गया।
मैं स्वयं को सौभाग्यशाली मानता हूं कि उत्तराखंड की ऐसी महान विभूति के साथ लगभग पांच घंटे बिताने का अवसर मिला, जिनका जीवन ज्ञान, कर्म, सादगी और सांस्कृतिक समर्पण का प्रेरणादायी उदाहरण है।
यह मुलाकात मेरे लिए केवल एक सुखद संयोग नहीं, बल्कि जीवन की उन अनमोल स्मृतियों में से एक है, जिन्हें वर्षों बाद भी याद करके मन प्रसन्नता से भर उठेगा।
मैं डॉ. यशोधर मठपाल जी के स्वस्थ, सक्रिय और आनंदमय जीवन की हृदय से कामना करता हूं। ईश्वर उन्हें उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु और निरंतर ऊर्जा प्रदान करें, ताकि उनका अनुभव, ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत के प्रति समर्पण आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहे।

मेरा सौभाग्य, मेरा गर्व
डॉ. यशोधर मठपाल जी जैसे व्यक्तित्व किसी प्रदेश की पहचान ही नहीं, उसकी आत्मा और अमूल्य धरोहर होते हैं।
उनसे मिलना, उनके साथ यात्रा करना, उनकी जीवनगाथा पर आधारित पुस्तक प्राप्त करना और उनके संग्रहालय आने का निमंत्रण पाना मेरे लिए अत्यंत गौरव और प्रसन्नता का विषय है।
आज की यह यात्रा मुझे हमेशा याद दिलाती रहेगी कि जीवन की सबसे मूल्यवान उपलब्धियां कभी-कभी किसी बड़े समारोह में नहीं, बल्कि एक सहज मुलाकात और आत्मीय संवाद में मिलती हैं।
उत्तराखंड के इस अनमोल रत्न, पद्मश्री डॉ. यशोधर मठपाल जी को मेरा सादर नमन। उनके स्नेह, आत्मीयता और प्रेरणादायी सान्निध्य के लिए हृदय से आभार।
कुछ यात्राएं मंजिल तक पहुंचकर समाप्त हो जाती हैं, लेकिन कुछ यात्राएं मन में एक नई प्रेरणा जगाकर जीवनभर साथ चलती हैं। ऋषिकेश से हल्द्वानी तक डॉ. यशोधर मठपाल जी के साथ बिताए ये पांच घंटे मेरे लिए ऐसी ही एक अनमोल यात्रा हैं।





