उत्तराखण्ड
2027 में हरीश रावत की भूमिका क्या होगी? कांग्रेस फिर खेलेगी ‘रावत कार्ड’, चुनाव न लड़कर भी बन सकते हैं बड़ा चेहरा
देहरादून। उत्तराखंड की सियासत में 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां लगातार तेज हो रही हैं। भाजपा जहां मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में सत्ता में वापसी की रणनीति पर आगे बढ़ रही है, वहीं कांग्रेस भी संगठन को सक्रिय करने और चुनावी जमीन मजबूत करने में जुटी है। इसी बीच पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत का 2027 विधानसभा चुनाव नहीं लड़ने का फैसला राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है।
हरीश रावत ने अगस्त में स्पष्ट किया था कि वह अगला विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे। हालांकि, उन्होंने राजनीति से संन्यास लेने की खबरों को खारिज किया और कहा कि कांग्रेस उन्हें जो जिम्मेदारी देगी, वह उसे पूरी प्रतिबद्धता के साथ निभाएंगे।
यानी साफ है कि रावत चुनावी मैदान से हट सकते हैं, लेकिन राजनीतिक मैदान से नहीं।
चुनाव नहीं लड़ेंगे तो क्या करेंगे हरीश रावत?
यही सवाल इस समय उत्तराखंड कांग्रेस की राजनीति में सबसे महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विधानसभा चुनाव नहीं लड़ने के बाद रावत के पास प्रदेश की राजनीति में कई संभावित भूमिकाएं हो सकती हैं।
वह कांग्रेस के लिए स्टार प्रचारक, चुनावी रणनीतिकार, वरिष्ठ सलाहकार अथवा पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच समन्वयक की भूमिका निभा सकते हैं।
एक विधानसभा सीट तक सीमित रहने के बजाय यदि रावत पूरे प्रदेश में कांग्रेस प्रत्याशियों के लिए प्रचार करते हैं तो पार्टी उनके लंबे राजनीतिक अनुभव का व्यापक इस्तेमाल कर सकती है।
हालांकि, उनकी वास्तविक जिम्मेदारी क्या होगी, इसका अंतिम फैसला कांग्रेस हाईकमान करेगा। अभी पार्टी की ओर से रावत की भूमिका को लेकर कोई अंतिम घोषणा नहीं हुई है।
क्या कांग्रेस 2027 में फिर खेलेगी ‘रावत कार्ड’?
राजनीतिक रूप से देखें तो यह संभावना पूरी तरह खारिज नहीं की जा सकती।
हरीश रावत उत्तराखंड की राजनीति में लंबे समय से सक्रिय रहे हैं और मुख्यमंत्री के रूप में भी प्रदेश का नेतृत्व कर चुके हैं। पहाड़ से लेकर मैदानी क्षेत्रों तक पार्टी संगठन और स्थानीय राजनीतिक समीकरणों की उनकी समझ कांग्रेस के लिए उपयोगी हो सकती है।
खासकर चुनाव के दौरान प्रत्याशी चयन, स्थानीय समीकरणों, असंतुष्ट नेताओं को साधने और अलग-अलग क्षेत्रों में पार्टी के पक्ष में माहौल बनाने में उनका अनुभव कांग्रेस के काम आ सकता है।
यही वजह है कि रावत का चुनाव नहीं लड़ना कांग्रेस के लिए उनकी राजनीतिक उपयोगिता समाप्त होने के बराबर नहीं है।
बल्कि कांग्रेस यदि रणनीतिक तरीके से आगे बढ़ती है तो रावत को किसी एक सीट के बजाय पूरे उत्तराखंड में पार्टी के लिए इस्तेमाल कर सकती है।
मुख्यमंत्री चेहरे को लेकर भी महत्वपूर्ण होंगे रावत
2027 के चुनाव में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा सवाल केवल भाजपा को चुनौती देने का नहीं होगा, बल्कि चुनाव के बाद नेतृत्व को लेकर भी होगा।
हरीश रावत स्वयं उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। ऐसे में उनके राजनीतिक प्रभाव को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।
हालांकि, रावत ने मुख्यमंत्री पद के चेहरे को लेकर यह संकेत दिया है कि यदि कांग्रेस सत्ता में आती है तो मुख्यमंत्री का फैसला पार्टी हाईकमान करेगा और प्रदेश संगठन उस निर्णय को स्वीकार करेगा।
इस बयान को राजनीतिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण माना जा सकता है।
यदि रावत स्वयं चुनाव नहीं लड़ते हैं और पार्टी उन्हें व्यापक चुनावी जिम्मेदारी देती है, तो वह मुख्यमंत्री पद की सीधी दौड़ से अलग रहते हुए भी कांग्रेस के सत्ता समीकरणों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
कांग्रेस के लिए रावत क्यों हैं महत्वपूर्ण?
उत्तराखंड की राजनीति में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठन को एकजुट रखने की है।
पार्टी में अलग-अलग नेताओं के अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र हैं। ऐसे में रावत जैसे वरिष्ठ नेता की भूमिका कार्यकर्ताओं और पुराने संगठनात्मक नेटवर्क को जोड़ने में महत्वपूर्ण हो सकती है।
दूसरी ओर कांग्रेस 2027 से पहले अपने आंदोलन और जनसंपर्क अभियान को भी तेज कर रही है। हाल में प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा ने पार्टी कार्यकर्ताओं और फ्रंट संगठनों को सरकार के खिलाफ मुद्दों पर आक्रामक तरीके से जनता के बीच जाने का निर्देश दिया है।
सितंबर और अक्टूबर में कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर के बड़े नेताओं की रैलियों की तैयारी भी कर रही है। इनमें मल्लिकार्जुन खरगे, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के कार्यक्रम शामिल हैं।
ऐसे माहौल में रावत का अनुभव पार्टी के प्रदेश स्तर के अभियान के लिए अहम हो सकता है।
लेकिन रावत के सामने भी है चुनौती
सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कांग्रेस रावत का इस्तेमाल करेगी या नहीं। बड़ा सवाल यह भी है कि रावत को कितनी राजनीतिक स्वतंत्रता और कितनी बड़ी जिम्मेदारी मिलेगी।
उत्तराखंड कांग्रेस में अलग-अलग नेताओं के बीच राजनीतिक संतुलन बनाना हाईकमान के लिए चुनौती रहेगा।
यदि रावत को बहुत बड़ी भूमिका दी जाती है तो दूसरे नेताओं के बीच असहजता पैदा होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। वहीं अगर पार्टी उन्हें पर्याप्त जिम्मेदारी नहीं देती तो उनके अनुभव और समर्थक नेटवर्क का पूरा फायदा उठाना मुश्किल हो सकता है।
इसलिए कांग्रेस के लिए रावत की भूमिका तय करना अपने आप में एक रणनीतिक फैसला होगा।
क्या रावत कांग्रेस के ‘ट्रंप कार्ड’ साबित हो सकते हैं?
2027 के चुनाव में यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस रावत को किस तरह मैदान में उतारती है।
यदि पार्टी उन्हें पूरे प्रदेश में प्रचार की जिम्मेदारी देती है, तो रावत का फोकस उन सीटों पर हो सकता है जहां कांग्रेस को मजबूत करने के लिए वरिष्ठ चेहरे की जरूरत है।
वह पुराने कांग्रेस कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने, नाराज नेताओं को साथ लाने और पार्टी के पक्ष में स्थानीय समीकरण बनाने में भूमिका निभा सकते हैं।
इस लिहाज से ‘रावत कार्ड’ का अर्थ जरूरी नहीं कि हरीश रावत खुद चुनाव लड़ें।
‘रावत कार्ड’ का मतलब यह भी हो सकता है कि कांग्रेस उनके अनुभव, जनसंपर्क और राजनीतिक नेटवर्क को चुनावी रणनीति का हिस्सा बनाए।
भाजपा के लिए भी चुनौती बन सकता है रावत फैक्टर
यदि कांग्रेस रावत को व्यापक चुनावी भूमिका देती है तो भाजपा के लिए भी यह एक राजनीतिक चुनौती हो सकती है।
भाजपा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में 2027 की तैयारी कर रही है और सत्ता में दोबारा वापसी की रणनीति पर काम कर रही है। ऐसे में कांग्रेस यदि अपने पुराने और अनुभवी नेताओं को एक मंच पर लाने में सफल रहती है तो मुकाबला और दिलचस्प हो सकता है।
हालांकि केवल किसी एक नेता की लोकप्रियता से चुनाव नहीं जीता जाता। संगठन, उम्मीदवार चयन, स्थानीय मुद्दे, सरकार के कामकाज, विपक्ष की एकजुटता और मतदाताओं का मूड—ये सभी चुनाव परिणाम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
असली तस्वीर चुनाव के करीब साफ होगी
फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि हरीश रावत 2027 में कांग्रेस के चुनावी अभियान की कमान संभालेंगे या उन्हें कोई दूसरी जिम्मेदारी मिलेगी।
लेकिन एक बात स्पष्ट है—हरीश रावत ने चुनाव नहीं लड़ने की बात कही है, राजनीति छोड़ने की नहीं।
इसलिए 2027 की उत्तराखंड की चुनावी बिसात में रावत का नाम अभी भी महत्वपूर्ण रहेगा।
अब नजर इस बात पर है कि कांग्रेस हाईकमान उन्हें किस भूमिका में देखता है। क्या वह सिर्फ वरिष्ठ मार्गदर्शक होंगे, क्या उन्हें स्टार प्रचारक बनाया जाएगा, या फिर चुनावी रणनीति में कोई बड़ी जिम्मेदारी दी जाएगी?
अगर कांग्रेस अपने संगठन को मजबूत करते हुए रावत के अनुभव और दूसरे वरिष्ठ नेताओं की ताकत को एक साथ इस्तेमाल करने में सफल रहती है, तो 2027 की लड़ाई में विपक्ष के लिए यह महत्वपूर्ण राजनीतिक पूंजी साबित हो सकती है।
फिलहाल उत्तराखंड की सियासत में सवाल यही है—हरीश रावत चुनाव नहीं लड़ेंगे, लेकिन क्या कांग्रेस उनके अनुभव का ‘रावत कार्ड’ जरूर खेलेगी?
आने वाले महीनों में इसका जवाब उत्तराखंड की चुनावी राजनीति की दिशा तय करने वाले महत्वपूर्ण संकेतों में से एक होगा।
