उत्तराखण्ड
बिक रहा है उत्तराखंड, बोलो खरीदोगे?
बागवानी, सरकारी उद्यान और पहाड़ की जमीन की बदलती तस्वीर पर वरिष्ठ लेखक चारू तिवाड़ी की 🔏 कलम से

उत्तराखंड में जमीन, बागवानी, कृषि और पहाड़ की अर्थव्यवस्था को लेकर बहस कोई नई नहीं है। पिछले दिनों जनपक्षधर पत्रकारिता से जुड़े रोबिन सिंह चौहान के चैनल ‘पंचायत रिपोर्टर’ पर “बिक रहा है उत्तराखंड, बोलो खरीदोगे?” शीर्षक से प्रसारित एक रिपोर्ट ने एक बार फिर इस सवाल को चर्चा के केंद्र में ला दिया।
रिपोर्ट में पहाड़ की जमीन और बदलती भू-व्यवस्था से जुड़े कई सवाल उठाए गए थे। रिपोर्ट के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों से हट जाने के बाद भी उससे जुड़े सवाल अपनी जगह कायम हैं।
वरिष्ठ लेखक चारू तिवाड़ी लंबे समय से उत्तराखंड की जमीन, बागवानी, पलायन और पहाड़ की अर्थव्यवस्था से जुड़े विषयों पर लिखते रहे हैं। वर्ष 2018 में ‘स्थायी राजधानी गैरसैंण संघर्ष समिति’ के बैनर तले आयोजित ‘पंचेश्वर से उत्तरकाशी’ तक की जन संवाद यात्रा के दौरान भी भू-कानून और सरकारी बगीचों की स्थिति का सवाल प्रमुखता से उठाया गया था।
इसी क्रम में प्रस्तुत है उनका पुराना लेख, जिसे वर्तमान संदर्भ में पुनः प्रकाशित किया जा रहा है।
उद्यानीकरण से रोजगार की हकीकत-2
(लेख पुराना, संदर्भ नया)
उत्तराखंड की बागवानी की दशा को समझने के लिए नैनीताल का रामगढ़ क्षेत्र एक महत्वपूर्ण उदाहरण रहा है। यहां अंग्रेजों के समय से सेब, आड़ू, पुलम, खुमानी और आलू जैसी फसलों की उन्नत खेती की जाती रही। वर्ष 1872 में यहां बगीचा लगाए जाने का उल्लेख मिलता है। चाय की खेती का प्रयोग भी हुआ और इसी कारण इस क्षेत्र को आज भी ‘चायना गार्डन’ के नाम से जाना जाता है।
आजादी के बाद सरकारी और निजी स्तर पर इन उद्यानों का स्वरूप बदलता गया। कभी फल उत्पादन और प्रसंस्करण की गतिविधियों के लिए पहचाने जाने वाले क्षेत्रों में समय के साथ कई जगह होटल, रिजॉर्ट और अन्य निर्माण दिखाई देने लगे।
रामगढ़ और मुक्तेश्वर क्षेत्र कभी विभिन्न प्रजातियों के सेब, आड़ू, खुमानी और पुलम के लिए प्रसिद्ध रहे। स्थानीय लोगों के अनुसार यहां की बागवानी पहाड़ में आजीविका का मजबूत मॉडल बन सकती थी, लेकिन शोध, गुणवत्तापूर्ण पौध, प्रमाणिक बीज, बाजार और प्रसंस्करण की सुविधाओं की कमी ने इस क्षेत्र को प्रभावित किया।
स्थानीय जानकारों के अनुसार आड़ू, खुमानी, आलू और अन्य फसलों के उत्पादन में भी कई तरह की समस्याएं सामने आई हैं। पुराने फलदार पेड़ों के स्थान पर नए पौधे लगाने की प्रक्रिया पर्याप्त गति से नहीं हो पाई। फसलों में नई बीमारियां आईं और किसानों को बाजार की समस्या का सामना करना पड़ा।
प्रमाणिक बीज और आलू की खेती
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में कभी कई स्थानों पर आलू बीज उत्पादन फार्म स्थापित किए गए थे। इन केंद्रों पर प्रमाणिक बीज तैयार कर स्थानीय किसानों तक पहुंचाया जाता था।
प्रमाणिक बीज की उपलब्धता को लेकर किसानों की अपनी अलग जरूरतें और अनुभव रहे हैं। जब गुणवत्तापूर्ण बीज की आपूर्ति कमजोर हुई तो कई क्षेत्रों में आलू उत्पादन भी प्रभावित हुआ।
हालांकि पिथौरागढ़ के कुछ क्षेत्रों में सहकारिता के आधार पर किसानों द्वारा प्रमाणिक बीज के उपयोग से बेहतर उत्पादन के उदाहरण भी सामने आए हैं। यह बताता है कि उचित बीज, तकनीक, स्थानीय भागीदारी और बाजार उपलब्ध हों तो पर्वतीय कृषि को मजबूत किया जा सकता है।
आंकड़ों और जमीन की वास्तविकता के बीच सवाल
बागवानी और कृषि को लेकर सरकारी आंकड़े लंबे समय से चर्चा का विषय रहे हैं। विभिन्न रिपोर्टों में सरकारी आंकड़ों और जमीनी सर्वेक्षणों के बीच अंतर की बात सामने आती रही है।
इसी संदर्भ में उद्यान विभाग से जुड़े आंकड़ों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए गए हैं। लेख में पूर्ववर्ती रिपोर्टों और समितियों का हवाला देते हुए बताया गया है कि कई स्थानों पर सरकारी आंकड़ों और वास्तविक स्थिति में बड़ा अंतर पाया गया।
यह सवाल आज भी महत्वपूर्ण है कि यदि सरकारी आंकड़े बड़े उत्पादन और बड़े क्षेत्रफल की तस्वीर दिखाते हैं, तो उसका प्रत्यक्ष लाभ किसान की आय, रोजगार और पलायन की स्थिति में कितना दिखाई देता है?
बंद होती प्रसंस्करण इकाइयां
कृषि और बागवानी की सफलता केवल उत्पादन तक सीमित नहीं होती। उत्पादन के बाद प्रसंस्करण, पैकेजिंग, भंडारण और बाजार की व्यवस्था भी उतनी ही जरूरी है।
उत्तराखंड में अलग-अलग समय पर स्थापित कई फूड प्रोसेसिंग यूनिट और कोल्ड स्टोरेज लंबे समय तक प्रभावी ढंग से संचालित नहीं हो सके। रामगढ़ की पुरानी प्रसंस्करण इकाई से लेकर चौबटिया के एप्पल जूस प्रसंस्करण केंद्र और अन्य स्थानों की इकाइयों का उदाहरण इस सवाल को सामने लाता है कि उत्पादन के साथ पूरी वैल्यू चेन विकसित क्यों नहीं हो सकी।
स्थानीय स्तर पर छोटे उद्यमियों ने अपने प्रयासों से काम जरूर शुरू किया, लेकिन बाजार, पूंजी और सरकारी सहयोग की कमी जैसी चुनौतियां उनके सामने बनी रहीं।
चौबटिया से एप्पल मिशन तक
उत्तराखंड की बागवानी के इतिहास में चौबटिया गार्डन का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। यहां हुए शोध और प्रशिक्षण का प्रभाव हिमालयी क्षेत्रों में बागवानी के विकास से जोड़ा जाता रहा है।
बाद के वर्षों में निजी प्रयासों से भी कई नए बगीचे विकसित हुए। अल्मोड़ा के रीची-बिल्लेख जैसे क्षेत्रों में सेब और जैविक खेती के प्रयोगों ने यह दिखाया कि उचित तकनीक और बाजार मिलने पर पर्वतीय कृषि में संभावनाएं मौजूद हैं।
पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत द्वारा उत्तराखंड एप्पल मिशन की घोषणा का भी लेख में उल्लेख किया गया है। ऐसे प्रयासों का वास्तविक मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि उनसे कितने किसान जुड़े, उनकी आय में कितना बदलाव आया और कितने क्षेत्रों में स्थायी बागवानी विकसित हुई।
शोध संस्थान बहुत, किसान तक परिणाम कितना?
उत्तराखंड में कृषि और बागवानी के लिए अनेक संस्थान मौजूद हैं। पंतनगर स्थित गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, कृषि विज्ञान केंद्र, कृषि प्रसार केंद्र तथा अन्य संस्थान लंबे समय से कृषि एवं बागवानी पर काम कर रहे हैं।
इसके बावजूद सवाल यह है कि इन संस्थानों का शोध पहाड़ के छोटे और सीमांत किसान तक किस रूप में पहुंचता है?
किसान के लिए शोध तभी उपयोगी है जब वह बेहतर बीज, तकनीक, कम लागत, बेहतर उत्पादन, प्रसंस्करण और निश्चित बाजार में बदल सके।
जमीन, कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग और किसान
लेख में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। किसान की बंजर या कम उपयोग वाली जमीन को कंपनियों को लीज पर देने की व्यवस्था एक विकल्प हो सकती है, लेकिन इसके साथ किसान के अधिकार, जमीन की सुरक्षा, अनुबंध की शर्तें और दीर्घकालीन आर्थिक लाभ जैसे सवालों पर स्पष्ट नीति आवश्यक है।
किसान को केवल अपनी जमीन किसी दूसरे के हवाले करने के लिए प्रोत्साहित करने के बजाय ऐसी व्यवस्था विकसित करने की जरूरत है जिसमें किसान सामूहिक रूप से उत्पादन करे, उत्पाद की प्रोसेसिंग और ब्रांडिंग करे और बड़े बाजार तक खुद पहुंच बनाए।
पहाड़ के सामने असली सवाल
उत्तराखंड में खेती और बागवानी की संभावनाओं को लेकर निराश होने की जरूरत नहीं है। आज भी कई किसान अपने स्तर पर सफल प्रयोग कर रहे हैं। सेब, आड़ू, खुमानी, सब्जी, मशरूम, जैविक खेती और स्थानीय उत्पादों में संभावनाएं मौजूद हैं।
लेकिन इन संभावनाओं को टिकाऊ अर्थव्यवस्था में बदलने के लिए केवल घोषणाएं पर्याप्त नहीं होंगी।
जरूरत है—
बेहतर शोध की।
गुणवत्तापूर्ण बीज और पौध की।
स्थानीय प्रसंस्करण इकाइयों की।
कोल्ड स्टोरेज और परिवहन की।
किसान को उचित बाजार की।
और सबसे महत्वपूर्ण—ऐसी नीति की जिसमें पहाड़ का किसान अपनी जमीन और अपने उत्पादन का वास्तविक मालिक बना रहे।
उत्तराखंड की जमीन केवल संपत्ति नहीं है। यह यहां की कृषि, बागवानी, आजीविका, पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों से जुड़ा प्रश्न है।
इसीलिए सवाल सिर्फ यह नहीं कि “उत्तराखंड में जमीन बिक रही है या नहीं?”
बड़ा सवाल यह है कि जिस जमीन पर पहाड़ का भविष्य टिका है, उसके बारे में फैसले कौन ले रहा है और उसका लाभ आखिर किसे मिल रहा है?
संदर्भ
- कुमाऊं का इतिहास — बद्रीदत्त पांडे
- शोधगंगा में प्रकाशित उत्तराखंड में उद्यानीकरण का इतिहास, अध्याय-5
- शरदोत्सव रानीखेत स्मारिका-1993 में रामलाल शाह का लेख — A Short History of Government Garden, Chaubattia
- निदेशालय, उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण, उत्तराखंड
- डॉ. राजेन्द्र कुकसाल, वरिष्ठ सलाहकार, कृषि/उद्यान एकीकृत सहयोग परियोजना (ILSP) एवं सेवा इंटरनेशनल, उत्तराखंड से बातचीत
- रामगढ़ से पृथ्वी सिंह, भीमताल से संजीव भगत और रानीखेत से गोपाल उप्रेती से प्राप्त जानकारी
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