धर्म-संस्कृति
श्राद्ध पक्ष का वैज्ञानिक और शास्त्रीय महत्व
सभी सनातनी प्रेमियों को सस्नेह नमस्कार, प्रणाम एवं जय माता दी।
जैसा कि आप सभी को विदित है, पितृ पक्ष (महालय श्राद्ध) प्रारंभ हो रहा है। ऐसे समय में आप सभी के मन में अनेक संशय उत्पन्न होते हैं—
क्या पितृ पक्ष में नित्य देव-पूजन और शंखनाद करना चाहिए?
माथे पर तिलक लगाना चाहिए?
और यदि लगाना चाहिए तो किस प्रकार का?
आप सभी के इन्हीं संशयों को दूर करने के लिए इस आलेख के माध्यम से प्रामाणिक शास्त्र-वचनों और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को प्रस्तुत किया जा रहा है।
1. श्राद्ध पक्ष में नित्य देव-पूजा व शंख ध्वनि–
पितृ पक्ष में नित्य देव-पूजन, संध्यावंदन और नित्य आरती-शंखनाद पूरी तरह शास्त्रसम्मत हैं। धर्मसिन्धु एवं निर्णयसिन्धु ग्रंथ में स्पष्ट निर्देश है कि मनुष्य को अपने नित्य कर्म का कभी त्याग नहीं करना चाहिए–
नित्यं नित्यकर्म कुर्यान्न हापयेत्।
(अर्थात: दैनिक पूजा-अर्चना, संध्यावंदन और आरती जैसे अनुष्ठान पितृ पक्ष में भी अनवरत चलते रहने चाहिए।)
विशेष ध्यान देने योग्य तथ्य: केवल अपराह्न के समय जब आप विशेष पितृ-तर्पण और पिंडदान कर रहे हों, उस विशिष्ट क्षण में शंखनाद वर्जित होता है, जिससे पितृ-तरंगों में विघ्न न पड़े।
प्रातःकाल की नित्य पूजा और आरती में शंख ध्वनि करना पूरी तरह विधि-सम्मत है।
2. श्राद्ध पक्ष में व्रत व उपवास नियम–
कई जातकों का प्रश्न रहता है कि पितृपक्ष में नित्य उपवास करने चाहिए या नहीं?
इस संदर्भ में निर्णयसिन्धु आदि ग्रंथों में स्पष्ट उल्लेख है–
एकादश्यादिनियतं व्रतं यत् सर्वदा भवेत्।
पितृपक्षेऽपि तत्कार्यं न त्याज्यं तु कदाचन॥
(अर्थात: एकादशी आदि जो सदैव किए जाने वाले व्रत-उपवास हैं, उन्हें पितृपक्ष में भी अवश्य करना चाहिए इनका त्याग कभी नहीं करना चाहिए।)
अतः आप पितृपक्ष के दौरान भी अपने नित्य व्रत (जैसे एकादशी, चतुर्थी, प्रदोष, पूर्णिमा आदि) नि:संकोच रख सकते हैं।
3. नित्य कर्म एवं मांगलिक कार्य–
शास्त्रीय दृष्टिकोण से श्राद्ध पक्ष में नित्य देव-पूजा जैसे दैनिक कर्म पूर्ववत रहेंगे, किंतु समस्त प्रकार के नूतन व मांगलिक शुभ कार्य (जैसे विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन आदि) वर्जित रहते हैं। इसका शास्त्रीय कारण यह है कि यह समय पूर्ण रूप से हमारे पूर्वजों की स्मृति, तर्पण और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए समर्पित होता है।
4. तिल व कुशा का शास्त्रीय महत्व–
पितृ तर्पण और पिंडदान में काले तिल और कुशा का उपयोग अनिवार्य है। मत्स्य पुराण एवं गरुड़ पुराण के अनुसार काले तिल की उत्पत्ति भगवान विष्णु के स्वेद (पसीने) से हुई है-
तिलैः समेताः पितरस्तृप्यन्ति हि तिलैः सह।
(काले तिल के प्रयोग से पितर पूर्णतः तृप्त होकर प्रसन्नता प्रदान करते हैं।)
शास्त्रों में कुशा को अति पवित्र माना गया है। कुशा के मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु और अग्रभाग में शिव का वास होता है। तर्पण के समय अनामिका उंगली में कुशा की ‘पवित्री’ धारण करने से शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है।
5. कौवों को भोजन कराने का वैज्ञानिक महत्व–
कौवों को भोजन देना पितृ-श्रद्धा के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण का अनूठा उपाय है। बरगद और पीपल जैसे विशाल वृक्षों के फल अत्यधिक सख्त होते हैं। जब कौवे इन्हें खाते हैं, तो उनके पेट की पाचन क्रिया से इन बीजों का कड़ा आवरण गल जाता है। इसके बाद कौवे जहाँ भी बीट (विष्ठा) करते हैं, वहाँ ये बीज आसानी से अंकुरित हो जाते हैं। इन वृक्षों को सीधे उगाना कठिन होता है, इसलिए कौवों की उपस्थिति हमारी धरती के पारिस्थितिकी संतुलन के लिए अत्यंत आवश्यक है।
6. तिलक धारण करने का नियम एवं महत्व–
श्राद्ध कर्म एवं पितृ तर्पण के समय मस्तक पर तिलक लगाने का स्पष्ट विधान है। निर्णयसिन्धु एवं मार्कण्डेय पुराण के अनुसार:–
रोचनं पद्मकं शङ्खं कुङ्कुमं रक्तचन्दनम्।
एतानि भस्मना सार्धं तर्पणेषु नियोजयेत्॥
बिना तिलक किया गया कोई भी अनुष्ठान पूर्ण नहीं माना जाता।
शास्त्रीय एवं व्यावहारिक पक्ष: तर्पण व श्राद्ध के समय चंदन, गोपीचंदन या भस्म का तिलक आज्ञा चक्र को शांत और एकाग्र रखता है।
लोक-व्यवहार में लाल कुमकुम को अति-उल्लास व मांगलिक कार्यों का प्रतीक माना जाता है, इसलिए श्राद्ध कर्म के दौरान सौम्य चंदन (श्वेत/पीला) या भस्म लगाना अधिक उपयुक्त माना गया है, यद्यपि शास्त्रीय पूजन में चंदन-केसर का प्रयोग पूरी तरह शास्त्रसम्मत है।
7. वास्तविक कृतज्ञता:– जीवित माता-पिता का सम्मान
दिवंगत पूर्वजों के तर्पण के साथ-साथ जीवित माता-पिता की सेवा ही परम धर्म है। श्राद्ध पक्ष में हम उन सभी पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं जो इस लोक से जा चुके हैं। यह परंपरा अत्यंत पवित्र है।
परंतु, मेरा आप सभी से करबद्ध निवेदन है कि हमारे जो जीवित माता-पिता आज हमारे सम्मुख हैं, उनके प्रति भी हम हृदय से प्रेम और कृतज्ञता व्यक्त करें। हर परिस्थिति में उनका सम्मान करें और उन्हें प्रसन्न रखें,क्योंकि प्रत्यक्ष ईश्वर माता-पिता ही हैं।
आइए, इस श्राद्ध पक्ष में अपने दिवंगत पितरों को नमन करने के साथ-साथ अपने जीवित माता-पिता की सेवा का संकल्प लेकर अपने जीवन को सार्थक बनाएं।
ज्योतिषाचार्य डॉ. मंजू जोशी
वैदिक ज्योतिष एवं वास्तुविशेषज्ञ
8395806256
