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विकास की दौड़ में प्रकृति का बलिदान कब तक? ऋषिकेश के सात मोड़ पर पेड़ों की कटाई गंभीर चिंता का विषय।

उत्तराखण्ड

विकास की दौड़ में प्रकृति का बलिदान कब तक? ऋषिकेश के सात मोड़ पर पेड़ों की कटाई गंभीर चिंता का विषय।

  • विनोद जोशी

देवभूमि उत्तराखंड अपनी प्राकृतिक सुंदरता, घने जंगलों, स्वच्छ वातावरण और जैव विविधता के कारण पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। लेकिन आज यही प्रकृति विकास परियोजनाओं की कीमत चुका रही है। देहरादून–ऋषिकेश राष्ट्रीय राजमार्ग के सात मोड़ क्षेत्र में सड़क चौड़ीकरण और अन्य निर्माण कार्यों के लिए बड़ी संख्या में हरे-भरे पेड़ों की कटाई ने पर्यावरण प्रेमियों, स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों की चिंता बढ़ा दी है। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार इस परियोजना में हजारों पेड़ों के प्रभावित होने की बात सामने आई है, जिसे लेकर लगातार विरोध भी हो रहा है।

यह सत्य है कि प्रदेश के विकास के लिए बेहतर सड़कें, सुगम यातायात और आधुनिक आधारभूत सुविधाएं आवश्यक हैं। चारधाम यात्रा, पर्यटन और स्थानीय लोगों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए सड़क परियोजनाओं का महत्व भी कम नहीं है। लेकिन विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है। यदि विकास की हर परियोजना हजारों पेड़ों की बलि लेकर आगे बढ़ेगी तो आने वाली पीढ़ियों को इसका गंभीर परिणाम भुगतना पड़ेगा।

सात मोड़ क्षेत्र केवल पेड़ों का समूह नहीं है, बल्कि यह वन्यजीवों, पक्षियों और अनेक जीव-जंतुओं का प्राकृतिक आवास भी है। जंगलों का लगातार कम होना जलवायु परिवर्तन, बढ़ते तापमान, भूजल स्तर में गिरावट और वन्यजीवों के आवास पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। उत्तराखंड जैसे संवेदनशील हिमालयी राज्य में पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखना किसी भी विकास परियोजना से कम महत्वपूर्ण नहीं है।

परियोजना से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि सड़क चौड़ीकरण से यातायात सुगम होगा, जाम कम होगा तथा पर्यावरणीय प्रभाव कम करने के लिए कुछ पेड़ों का प्रतिरोपण और वन्यजीवों की सुरक्षा हेतु विशेष संरचनाएं भी बनाई जा रही हैं।

फिर भी जनता की मांग है कि यदि किसी पेड़ को बचाया जा सकता है तो उसे बचाया जाए। आधुनिक इंजीनियरिंग तकनीकों का उपयोग कर ऐसे विकल्प तलाशे जाएं जिनसे पेड़ों की कटाई न्यूनतम हो। जहां कटाई अपरिहार्य हो, वहां केवल औपचारिक पौधारोपण नहीं बल्कि वर्षों तक उनकी देखरेख और जीवित रहने की जिम्मेदारी भी तय की जानी चाहिए।

प्रकृति केवल आज की नहीं, आने वाली पीढ़ियों की भी धरोहर है। यदि जंगल समाप्त होंगे तो शुद्ध हवा, स्वच्छ जल और जैव विविधता भी धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगी। उत्तराखंड की पहचान उसके पर्वत, नदियां और जंगल हैं। इन्हें बचाए बिना विकास का कोई भी मॉडल अधूरा रहेगा।

राज्य सरकार, राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण, वन विभाग और संबंधित एजेंसियों से आग्रह है कि इस परियोजना की पर्यावरणीय समीक्षा पूरी पारदर्शिता के साथ सार्वजनिक की जाए, स्थानीय लोगों और पर्यावरण विशेषज्ञों की राय को गंभीरता से सुना जाए तथा विकास और प्रकृति के बीच ऐसा संतुलन बनाया जाए जिससे सड़कें भी बनें और देवभूमि की हरियाली भी सुरक्षित रहे।

पेड़ केवल आज की आवश्यकता नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की सांस हैं। विकास की राह ऐसी होनी चाहिए, जिसमें प्रकृति साथ चले, पीछे न छूटे।

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