धर्म-संस्कृति
शताब्दियों पुराने ग्रंथों से खुला कैलाश मानसरोवर का रहस्य: जब पृथ्वी बनी स्त्री और राजा मान्धाता ने रच दिया इतिहास।
हिमालय की गोद में बसे कैलाश-मानसरोवर से जुड़े रहस्य आज भी आस्था, इतिहास और पुराणों के अद्भुत संगम का प्रतीक हैं। स्कन्दपुराण के मानसखण्ड में वर्णित एक दुर्लभ कथा बताती है कि आखिर मानसरोवर की उत्पत्ति कैसे हुई। यह केवल एक पौराणिक आख्यान नहीं, बल्कि शिवभक्ति, धर्म और हिमालय की दिव्यता से जुड़ी रोमांचकारी गाथा है।
कथा के अनुसार, महर्षि धन्वन्तरि ने आदि गुरु दत्तात्रेय से प्रश्न किया कि इस दुर्गम हिमालय का परिचय सबसे पहले किसने प्राप्त किया। उत्तर में सूर्यवंशी राजा मान्धाता की अद्भुत कथा सामने आती है।
एक रात यज्ञ के उपरांत विश्राम कर रहे राजा मान्धाता के सामने स्वयं पृथ्वी एक अनुपम सुंदरी का रूप धारण कर प्रकट हुई। उसने राजा से विवाह का प्रस्ताव रखा, लेकिन राजा ने अपने एकपत्नीव्रत का पालन करते हुए उसे अस्वीकार कर दिया। बाद में शिव की सौगंध पर वे उसे अपनी सहचरी के रूप में स्वीकार करते हैं और दोनों लंबे समय तक साथ विचरण करते हैं।
समय बीतने पर जब राजा तपस्या के लिए वन जाने का निश्चय करते हैं, तभी पृथ्वी अट्टहास करती है। राजा इसे अपना उपहास समझ बैठते हैं और क्रोध में तलवार लेकर उसके पीछे दौड़ पड़ते हैं। भयभीत पृथ्वी हिमालय के मानस क्षेत्र में पहुँचकर धरती के भीतर समा जाती है।
राजा मान्धाता अपने दिव्य बाणों से उस स्थान की खुदाई करने लगते हैं। तभी धरती के गर्भ से स्वर्णहंस के समान तेजस्वी शिवलिंग प्रकट होता है। महादेव के इस दिव्य स्वरूप के दर्शन होते ही राजा का क्रोध शांत हो जाता है और वे शिव आराधना में लीन हो जाते हैं।
इसके बाद राजा अपने बाणों से उस क्षेत्र को विशाल जलाशय का स्वरूप देते हैं। गंगा की पवित्र धाराओं से भरकर यही दिव्य सरोवर आगे चलकर मानसरोवर कहलाया। पुराणों के अनुसार, इस महान कार्य से प्रसन्न होकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश स्वयं प्रकट हुए और राजा मान्धाता को आशीर्वाद प्रदान किया।
मानसखण्ड में वर्णित यह कथा केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि हिमालय और कैलाश क्षेत्र की सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक विरासत का अनमोल दस्तावेज भी मानी जाती है। यह बताती है कि किस प्रकार एक राजा की अटूट शिवभक्ति और दिव्य घटनाओं ने संसार को कैलाश क्षेत्र का सबसे पवित्र तीर्थ—मानसरोवर—प्रदान किया।
