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द्वी दिना का ड्यार शेरुवा यौ दुनि मैं/ना त्यारा ना म्यार शेरुवा यौ दुनी में’!

उत्तराखण्ड

द्वी दिना का ड्यार शेरुवा यौ दुनि मैं/ना त्यारा ना म्यार शेरुवा यौ दुनी में’!

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक: “चारु तिवारी” की कलम से

हम उन दिनों हम काॅलेज में पढ़ रहे थे। सुना कि रानीखेत के गोल्फ ग्राउंड में एक फिल्म की शूटिंग चल रही है। हमारा इस फिल्म के प्रति इसलिए भी आकर्षण था कि इसके निर्माता जीवन सिंह बिष्ट हमारे बग्वालीपोखर में स्टेट बैंक की शाखा के पहले बैककर्मियों में से एक थे। जब 1987 में ‘मेघा आ’ के नाम से फिल्म आई तो उसमें एक गीत सुना- ‘यौ डाना कौ पारा, देख्यूंछ न्यारा-न्यारा/जब तू एैंछे, एै जैंछो बहारा।’ इस मधुर आवाज ने एक ऐसे लोकगायक से परिचित कराया जो हमारे न केवल प्रिय गायक रहे, बल्कि बाद में अच्छे मित्र भी बन गए। पिछले दिनों जब दीवान दा (दीवान कनवाल) और भाई डाॅ. अजय ढौंडियाल की जोड़ी (अजय-दीवान) शेरदा अनपढ़ के कालजयी गीत ‘द्वी दिना का ड्यार शेरुवा यौ दुनि मैं/ना त्यारा ना म्यार शेरुवा यौ दुनी में’ गा रहे थे तो हम सोच भी नहीं सकते कि दीवान दा इतनी जल्दी डेरे को छोड़कर चले जाएंगे। अपने प्रिय गायक एवं मित्र दीवान दा को अश्रुपूर्ण विदाई। अलविदा दीवान दा।

दीवान सिंह कनवाल ऐसे लोकगायकों थे, जिनकी आवाज में पहाड़ की आत्मा बसती थी। उन्होंने पहाड़ के गीत ही नहीं गाए, पहाड़ को जिया भी। इसलिए उनकी आवाज में पहाड़-सी कसक थी। सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा के खत्याड़ी गांव में जन्मे दीवान दा के साथ कब से हमारा मिलना हुआ यह तो याद नहीं, उनके गीतों को सुनना और पिछले डेढ दो दशक से उनके साथ आत्मीयता के संबंधों ने उनकी कला और संवेदनाओं को बहुत गहरे तक समझने का मौका मिला। उनका समय-समय पर फोन आ जाना हमेशा अपासी संबंधों की ताप को बनाए रखता। दिल्ली में पिछले कुछ सालों में हमने कई होली और अन्य सांस्कृतिक आयोजन किए। इनमें दीवान दा की अनिवार्य उपस्थिति होती। एक सहज-सरल और मिलनसार व्यक्ति के रूप में उनकी आभा अलग थी। सिर पर हैट लगाए उनका रूप सुदर्शन था।

दीवान दा ने अर्थशास्त्र में एमए किया। उनके पिता त्रिलोक सिंह कनवाल भी सांस्कृतिक व्यक्ति थे। अल्मोड़ा की रामलीलाओं में ताड़का और खर-दूषण के पात्रों में वह प्राण डाल देते थे। उनका असर दीवान दा पर भी पड़ा। उन्होंने अपनी सांस्कृतिक यात्रा रामलीलाओं से ही की। अल्मोड़ा की सुप्रसिद्ध ‘हुक्का क्लब’ की रामलीला में उन्होंने मंदोदरी के अभिनय से अपनी शुरुआत की। बाद में उन्होनंे परशुराम और दशरथ के अभिनय से दर्शकों में अपनी खास पहचान बनाई। दीवान दा 1980 में नजीबाबाद रेडियो स्टेशन में बी-ग्रेड कलाकार के रूप में शामिल हो गए। बाद में आकाशवाणी अल्मोड़ा में बी-हाई ग्रेड कलाकार रहे। उनके जीवन में नया मोड़ तब आया जब वे 1984 में दिल्ली आए और यहां उनकी मुलाकात सुप्रसिद्ध संगीतकार मोहन उप्रेती से हुई। ‘पर्वतीय कला केंद्र’ के साथ जुड़कर उन्होंने गीत-संगीत और रंगकर्म की बारीकियां सीखीं। उस समय बीएम साह ‘राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय’ के निदेशक थे। इन लोगों के सान्निध्य में उन्हें एक रास्ता मिला। यहां उन्होंने ‘रसना’ कंपनी में काम किया। पारिवारिक कारणों से उन्हें वापस अल्मोड़ा आना पड़ा, लेकिन उनकी रचनात्मकता बनी रही। इसी बीच जीवन सिंह बिष्ट कुमाऊं की पहली फिल्म ‘मेघा आ’ बना रहे थे। इसमें दीवान दा ने गीत गाए। वह अल्मोड़ा को-आॅपरेटिव बैंक में नौकरी में लगे और बाद में वहीं से रिटायर हुए।

दीवान दा इस बीच गीत-संगीत, रामलीला और नाटकों में काफी सक्रिय हुए। उन्होंने ‘थात बात’, ‘सुवा’, ‘पैलाग’, ‘हुड़की घमा-घम’, ‘नंदा चालीसा’, ‘जय मैया बाराही’, ‘सुफल हैई जै पंचनाम देवा’ आदि एलबम बनाई। उनके बहुत सारे गीत लोगों की जुबान पर रहते हैं। उनके प्रसिद्ध गीतों में ‘यौ डानौं को पारा….’, ‘आज कौंछे मैत जा, भौल कौंछे मैंत जा….’, ‘दाज्यू हमरि घरवाई रिसै गे….’, ‘कसि भिड़ै कुनई पंडित ज्यू….’, ‘ह्यूं भरी दाना….’ आदि प्रसिद्ध हुए। दीवान दा ने बहुत सारे नाटकों में भी अभिनय और निर्देशन किया। ‘कलबिष्ट’, ‘गंगनाथ’, ‘हरूहीत’, ‘बाइस भाई बफौल’, ‘तीलू रौतूली’, ‘सरू कुमैण’, ‘गढ़ सुम्याल’ नाटक प्रमुख हैं।

दीवान दा पिछले कुछ दिनों से डाॅ. अजय ढौंडियाल के साथ मिलकर जो जुगलबंदी की उसे लोगों ने काफी सराहा। ‘अजय-दीवान’ के नाम से उन्होंने पहाड़ के कई लोकगीतों और प्रचलित गीतों को अपनी आवाज दी। कई गीतों को नए संगीत के साथ गाया। कुमाऊं के सुप्रसिद्ध लोककवि शेर सिंह बिष्ट ‘अनपढ़’ की कालजयी रचना ‘द्वी दिना का ड्यार शेरुवा यौ दुनीं में….’ बहुत पसंद किया गया। इस जोड़ी ने हीरासिंह राणा के गीतों ‘उत्तरखंड बणियां कतुक साल हैंगीं, स्वच कैं हमुल और कै हमार हाल हैगीं….’, ‘त्यर पहाड़-म्यर पहाड़, रौय दुखों कौ ड्यर पहाड़….’, ‘पहाड़ा पंछी छू हम….’ के अलावा ‘पुराण लोग….’, ‘ओ पांणी पन्यारा….’, ‘कमला यौ सारी झन जाए….’ जैसे लोग गीत भी गाए हैं। शिवप्रसाद पोखरियाल का लिखा गीत ‘जौं भरी की हौंणी होली… ठाठा लगाला…’ और नागेंद्र बेरिया का लिखा ‘सलम चैकीदारा…’ गीतों को नए अंदाज में गाया। अभी हाल में इन दोनों ने जौहार का एक लोक गीत ‘नैना रछम….’ बहुत मधुर संगीत के साथ गाया।

सुर-संगीत के इस साथी का अंतिम सलाम!

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