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उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय में “विद्यालय सुरक्षा और विद्यालय आपदा प्रबंधन (DM) योजना की तैयारी पर प्रशिक्षकों का प्रशिक्षण” पर तीन दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू

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उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय में “विद्यालय सुरक्षा और विद्यालय आपदा प्रबंधन (DM) योजना की तैयारी पर प्रशिक्षकों का प्रशिक्षण” पर तीन दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू


हल्द्वानी:उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय (यूओयू), हल्द्वानी और डॉ. आर.एस. टोलिया उत्तराखंड प्रशासन अकादमी (DRSTUAOA), नैनीताल के संयुक्त तत्वावधान में आज से “विद्यालय सुरक्षा और विद्यालय आपदा प्रबंधन (DM) योजना की तैयारी पर प्रशिक्षकों का प्रशिक्षण” विषय पर आधारित तीन दिवसीय ‘प्रशिक्षकों का प्रशिक्षण’ कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर नवीन चंद्र लोहनी की अध्यक्षता में आयोजित इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य शिक्षकों और प्रशासकों को आपदा के प्रति संवेदनशील बनाना और उन्हें भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार करना है। विश्वविद्यालय के कुलगीत और दीप प्रज्वलन के साथ शुरू हुए इस सत्र में कुल 30 प्रतिभागी प्रतिभाग कर रहे हैं, जिन्हें भविष्य के लिए ‘मास्टर ट्रेनर’ के रूप में प्रशिक्षित किया जा रहा है। कार्यक्रम समन्वयक डॉ. एच.सी. जोशी और कार्यक्रम निदेशक डॉ. ओम प्रकाश के कुशल नेतृत्व में, यह प्रशिक्षण शिक्षकों को संभावित खतरों की पहचान करने, संवेदनशीलता का वैज्ञानिक आकलन करने और आपातकालीन स्थितियों के लिए प्रभावी व त्वरित प्रतिक्रिया योजनाएं तैयार करने में सक्षम बनाएगा। कुलपति प्रोफेसर नवीन चंद्र लोहनी ने अपने उद्बोधन में उत्तरकाशी और चमोली जैसे भूकंपों से सीख लेने और ‘फायर सेफ्टी’ व ‘पूर्व-तैयारी’ के माध्यम से जोखिम को कम करने पर बल दिया। कार्यक्रम के दौरान सीका के निदेशक प्रोफेसर गिरजा पांडे ने अपने विचार साझा करते हुए आपदा प्रबंधन के व्यावहारिक पक्षों पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए स्कूलों में आपदा योजना का होना केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि जीवन सुरक्षा के लिए एक अनिवार्य आवश्यकता है।


तकनीकी सत्र में DMMC देहरादून के पूर्व अधिशासी निदेशक प्रो. आर.के. पांडे ने बताया कि आपदा प्रबंधन अब केवल राहत कार्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका मुख्य केंद्र ‘जोखिम प्रबंधन’ (बन गया है। उन्होंने ह्युगो और सेंडाई फ्रेमवर्क की तुलना करते हुए स्पष्ट किया कि आधुनिक रणनीतियों में वैज्ञानिक डेटा, सामुदायिक भागीदारी और ‘बिल्ड बैक बेटर’ (बेहतर पुनर्निर्माण) के सिद्धांतों को प्राथमिकता दी जा रही है। जापान के कोबे और तोहोलू भूकंपों का उदाहरण देते हुए उन्होंने आपदा-रोधी बुनियादी ढांचे और त्वरित चेतावनी प्रणालियों की महत्ता पर विशेष ज़ोर दिया। इस कार्यक्रम का संचालन वानिकी एवं पर्यावरण विज्ञान विभाग की सहायक प्राध्यापक डॉ. प्रीति पंत द्वारा किया गया। इस अवसर पर विभिन्न विभागों के प्राध्यापक प्रो. कमल देवलाल, डॉ. कृष्ण कुमार टम्टा, डॉ. बीना तिवारी, डॉ मीनाक्षी राणा, डॉ. राजेश मठपाल, डॉ. दीप्ति नेगी, डॉ. नेहा तिवारी, डॉ. खष्टी डसीला, डॉ. निर्मला तड़ागी एवं डॉ. प्रदीप कुमार पंत, उपस्थित रहे। यह प्रशिक्षण आगामी 12 फरवरी तक चलेगा, जिसमें विभिन्न तकनीकी सत्रों और मॉक ड्रिल के माध्यम से प्रतिभागियों को प्रशिक्षित किया जाएगा।

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