उत्तराखण्ड
हरदा और उत्तराखंडियत: पहाड़ की मिट्टी, बोली और भोजन से जुड़ी राजनीति
गाड़-गधेरे, नौले से लेकर काफल, माल्टा, आड़ू-बेड़ू, घिंघारू और पहाड़ी दालों तक—हरीश रावत ने उत्तराखंड की पहचान को राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाया
उत्तराखंड की राजनीति में कई नेता आए और गए, लेकिन कुछ नेताओं की पहचान केवल उनके पद से नहीं बनती। उनकी पहचान उस भाषा, संस्कृति, खान-पान और जीवनशैली से जुड़ जाती है, जिसे वे राजनीति के मंच पर भी साथ लेकर चलते हैं।
पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत यानी ‘हरदा’ को इसी नजरिए से देखने वालों की कमी नहीं है।
हरदा की राजनीति का एक महत्वपूर्ण पक्ष ‘उत्तराखंडियत’ रहा है। उनकी किताब उत्तराखंडियत, मेरा जीवन लक्ष्य और पिछले वर्षों में स्थानीय उत्पादों, पहाड़ी भोजन तथा लोक संस्कृति को लेकर किए गए उनके अभियानों ने इस शब्द को राजनीतिक बहस में प्रमुखता दी। इंडियन एक्सप्रेस ने भी 2025 में लिखा कि रावत उत्तराखंड की पहचान, संस्कृति और परंपराओं को केंद्र में रखकर राजनीतिक विमर्श तैयार कर रहे थे।
हरदा के लिए उत्तराखंड सिर्फ नक्शे का एक राज्य नहीं
उत्तराखंड को समझने के लिए केवल देहरादून और हल्द्वानी को देखना पर्याप्त नहीं है। असली उत्तराखंड उन गांवों में भी बसता है जहां आज भी गाड़-गधेरे बहते हैं, नौले और धारे जीवन का हिस्सा हैं, खेतों में मंडुवा-झंगोरा उगता है और जंगलों में काफल, बेड़ू, आड़ू, घिंघारू जैसे फल पहाड़ की पहचान हैं।
हरदा की राजनीति की खास बात यह रही कि उन्होंने इन चीजों को केवल गांव के घरों तक सीमित रहने देने के बजाय सार्वजनिक और राजनीतिक चर्चा में लाने की कोशिश की।
उनके अभियानों में काफल, माल्टा, मंडुवा, झंगोरा, गहत, भट्ट, नींबू, गलगल, गेठी, गुड़ और अन्य स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने की बात सामने आती रही है।
काफल पार्टी से लेकर पहाड़ी ककड़ी तक
हरीश रावत के ‘काफल पार्टी’ जैसे आयोजन केवल राजनीतिक कार्यक्रम नहीं थे। इनका एक घोषित उद्देश्य स्थानीय उत्पादों को पहचान दिलाना भी था।
2025 में आयोजित काफल पार्टी में रावत ने काफल को उत्तराखंड की भावनात्मक पहचान से जोड़ा और कहा कि स्थानीय उत्पादों को ‘लोकल से वोकल’ बनाने की जरूरत है। उन्होंने तिमला और बेड़ू जैसे स्थानीय उत्पादों से जुड़े आयोजन करने की भी बात कही।
इसी तरह पहाड़ी ककड़ी को लेकर भी उन्होंने कार्यक्रम किया और कहा कि काफल तथा पहाड़ी ककड़ी उत्तराखंड की जड़ों से जुड़े हैं और उन्हें बढ़ावा देने के लिए वह आगे भी काम करते रहेंगे।
भट्ट, गहत और पहाड़ी भोजन को पहचान दिलाने की कोशिश
उत्तराखंड की पहचान सिर्फ पर्यटन स्थलों से नहीं है। यहां का भोजन भी इसकी संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है।
भट्ट की चुड़काणी, भट्टवाणी, गहत, झंगोरे की खीर, मंडुवे की रोटी, पहाड़ी ककड़ी का रायता, चुटकाणी और कई पारंपरिक व्यंजन पहाड़ की पीढ़ियों से चली आ रही खान-पान की परंपरा हैं।
मुख्यमंत्री रहते हुए रावत ने उत्तराखंडी व्यंजनों को यात्रियों तक पहुंचाने की पहल की थी। 2015 में UTC से जुड़े एक प्रयोग में मंडुवे की रोटी, झंगोरे की खीर, चुटकाणी और भटवाणी जैसे स्थानीय व्यंजनों को यात्रियों तक पहुंचाने की बात सामने आई थी।
बाद के वर्षों में भी वह खुद पहाड़ी भोजन के आयोजनों से जुड़े रहे। 2024 में उनके आवास पर चुटकाणी, भट्टवाणी, मूली की थिंचौणी, भात और पहाड़ी ककड़ी के रायते का आयोजन हुआ।
आड़ू, बेड़ू, घिंघारू और पहाड़ की छोटी-छोटी पहचान
उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था को समझने के लिए केवल बड़े उद्योगों की बात करना पर्याप्त नहीं है।
आड़ू, बेड़ू, काफल, माल्टा, घिंघारू, तिमला, गलगल, नींबू और पहाड़ी मसालों जैसे उत्पाद हजारों परिवारों की स्थानीय अर्थव्यवस्था से जुड़े हो सकते हैं।
यही वह जगह है जहां हरदा की ‘उत्तराखंडियत’ वाली राजनीति दिखाई देती है—बड़े नारों के साथ छोटे उत्पादों की बात।
उनके समर्थकों के लिए यही उनकी पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। आलोचक इसे राजनीतिक शैली या ब्रांडिंग के रूप में देख सकते हैं, लेकिन यह तथ्य दर्ज है कि रावत ने लंबे समय तक स्थानीय उत्पादों और भोजन को सार्वजनिक अभियानों में प्रमुखता दी है।
गाड़-गधेरे और नौले: उत्तराखंडियत सिर्फ भोजन नहीं
उत्तराखंडियत का अर्थ केवल पहाड़ी खाना या फल नहीं है।
यह गांव की सामुदायिक जिंदगी, नौले-धारे, गाड़-गधेरे, जंगल, खेत, लोकभाषा, लोकगीत, मेले और परंपराओं से भी जुड़ा है।
रावत ने अपने राजनीतिक संकल्पों में स्थानीय भाषा—गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी—के शब्दों, मुहावरों और कविताओं के दैनिक इस्तेमाल तथा लोक संस्कृति के उन्नयन की बात भी रखी थी। उनके नौ संकल्पों में उत्तराखंडी उत्पादों के इस्तेमाल और असिंचित खेती वाले गांव को स्वावलंबी बनाने जैसे बिंदु भी शामिल थे।
यानी ‘उत्तराखंडियत’ को उन्होंने केवल राजनीतिक शब्द नहीं रहने दिया, बल्कि इसे भाषा, भोजन, खेती और संस्कृति से जोड़ने की कोशिश की।
हरदा की यही पहचान कांग्रेस के लिए कितनी महत्वपूर्ण?
2027 की राजनीति में कांग्रेस के सामने एक बड़ा सवाल संगठन और नेतृत्व के साथ-साथ अपनी अलग राजनीतिक पहचान स्थापित करने का भी है।
ऐसे में हरीश रावत की उत्तराखंडियत वाली राजनीति कांग्रेस के लिए एक संभावित राजनीतिक पूंजी हो सकती है।
हरदा के समर्थक मानते हैं कि उत्तराखंड के गांवों और आम कार्यकर्ताओं के बीच उनकी पहचान अभी भी बनी हुई है। दूसरी ओर, पार्टी के भीतर अन्य वरिष्ठ नेताओं और नेतृत्व की भी अपनी भूमिकाएं हैं।
इसलिए सवाल केवल यह नहीं है कि हरदा चेहरा होंगे या नहीं।
बड़ा सवाल यह है कि क्या कांग्रेस अपने वरिष्ठ नेताओं की ताकत को एक साथ जोड़कर उत्तराखंड की स्थानीय पहचान, रोजगार, पलायन, कृषि, पर्यटन, संस्कृति और गांव की अर्थव्यवस्था को केंद्र में रखकर कोई स्पष्ट राजनीतिक संदेश बना सकती है?
‘हरदा’ की राजनीति में पहाड़ की खुशबू
हरीश रावत की राजनीति का यह पक्ष उन्हें दूसरे नेताओं से अलग पहचान देता है।
किसी नेता का जनता से जुड़ाव केवल चुनावी भाषणों से नहीं मापा जाता। कभी वह काफल की टोकरी लेकर बैठता है, कभी माल्टा की बात करता है, कभी भट्ट की चुड़काणी पर चर्चा करता है, कभी मंडुवे और झंगोरे की बात करता है और कभी स्थानीय भाषा और लोक संस्कृति को राजनीतिक विमर्श में लाता है।
यही वजह है कि उनके समर्थक कहते हैं—‘हरदा उत्तराखंड को सिर्फ राजनीति से नहीं, उसकी जड़ों से जानते हैं।’
यह दावा राजनीतिक समर्थन का हिस्सा है, लेकिन स्थानीय उत्पादों और संस्कृति को लेकर रावत की सार्वजनिक गतिविधियों का रिकॉर्ड इस बात की पुष्टि करता है कि यह विषय उनके राजनीतिक जीवन में लगातार दिखाई देता रहा है।
2027 में असली परीक्षा
2027 का चुनाव अभी भविष्य में है। इसलिए यह कहना कि किसी एक नेता के चेहरे से चुनाव का परिणाम तय हो जाएगा, उचित नहीं होगा।
लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि उत्तराखंड की पहचान और स्थानीय मुद्दों को केंद्र में रखकर राजनीति करने की हरदा की शैली कांग्रेस के चुनावी विमर्श में एक अलग जगह बना सकती है।
अगर पार्टी के सभी वरिष्ठ नेता व्यक्तिगत मतभेदों से ऊपर उठकर एक साझा अभियान चलाते हैं और हरदा के अनुभव तथा उनकी उत्तराखंडियत की पहचान को संगठन और युवा नेतृत्व के साथ जोड़ते हैं, तो यह कांग्रेस की रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।
उत्तराखंड की राजनीति में चेहरों की कमी नहीं है। सवाल यह है कि कौन सा चेहरा पहाड़ की आवाज, गांव की चिंता और उत्तराखंड की पहचान को सबसे प्रभावी ढंग से राजनीतिक संवाद में रख पाता है।
